उन फरिश्तों के आड़ में।

Avishek Sahu
August 21, 2018

कर गए थे सब कुछ जो फरिश्तों के आड़ में,

तबाह हो गई थी बहुत कुछ जो बिखरे रिश्तों की बाड़ में,

है तो ये बस सबक इस बरसती हुई संसार का

जहां बदलते हैं मौसम पतझड़ के प्रचार का

 

तो क्या रखा है बोलो उन भूली बिखरी सी कतलों में

जिनके ज़ायका हमें मिलती रही इन ज़ालिम सी फसलों में,

गर्मी पैदा जो करदे यूहीं तवे पे पकते हुए,

हम कहां ना बोलेथे उन रास्तों पे चखते हुए

 

बड़ी नहीं है काम मुकामों को मिटा देना,

मुकामें तो बस बनती रही, खुशी से लुटा देना,

उन मुकामों में क्या है गर्मी जिसको हम घायल करदें,

जिस गर्मी में भूख हो इतनी की सरहद पे बैठें बस फायर करदें

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